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आजीविका

कार्य का उद्देश्य – 

  • टेराकोटा की विलुप्त कला को पुनर्जीवित करना तथा आजीविका के रूप में इसे अपनाकर अपनी व्यावसायिक क्षमता का एहसास करना। स्थानीय कुम्हार तथा इच्छुक सामुदायिक सदस्यों को इसमें शामिल करना ताकि भविष्य में नए कौशलों को सीखें।
  • महिलाओं के माध्यम से खादी के प्रयोग को पुनर्जीवित करना, तैयार उत्पाद की बुनाई, कताई, रंगाई और सिलाई में महिलाओं को शामिल कर आजीविका के अवसर पैदा करना। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हितधारकों के साथ मधुर/आला संबंध हेतु स्थानीय स्तर पर महिलाओं को प्रोत्साहित करना।
  • स्थानीय साधनों तथा संसाधनों के माध्यम से अवसर उपलब्ध कराना। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के साथ समन्वय और सहयोग स्थापित करना तथा ग्रामीण समुदायों के बीच पारस्परिक संबंधों को बढ़ावा देना। 
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चुनौतियाँ – लाखों भारतीय अभी भी हाथ से बने उत्पादों तथा उत्पादन के पारंपरिक कौशल व तकनीक पर निर्भर है। यद्यपि कई प्रसिद्ध डिजाइन हाउसों ने हस्तनिर्मित उत्पादों के उपयोग हेतु उल्लेखनीय काम किया है। फिर भी शिल्प उत्पादन का अधिकांश हिस्सा असंगठित और अनौपचारिक रूप से कारीगरी द्वारा विशेष रूप से बना हुआ है, जो अपने मूल्यों की रक्षा करने के लिए संघर्ष करते है। बाज़ारों के नुकसान से उबरने, कौशल में गिरावट और नए बाज़ारों में खानपान की कठिनाई के कारण, बड़ी संख्या मे कारीगर रोजगार की तलाश में शहरी केंद्रों में चले गए हैं।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार पिछले 30 साल में भारतीय कारीगरों की संख्या में 30प्रतिशत कमी आई है। यह इतिहास, संस्कृति और आजीविका के एक महत्वपूर्ण स्रोत की सुरक्षा के लिए कारीगरों में फिर से निवेश करने की आवश्यकता को इंगित करता है। भारत सरकार, निजी क्षेत्र और गैर-लाभकारी प्रत्येक क्षेत्र में शामिल है। हालाँकि, समय के साथ विशेषज्ञता और बहुत दोहराव की कमी के साथ उनकी भूमिकाएँ विकसित नहीं हुई है। फंडिंग और कार्यक्रमों के माध्यम से शिल्प पारिस्थितिकी तंत्र के सामने आने वाली चुनौतियों को दूर करने के लिए एकजुट और ठोस प्रयास की आवश्यकता है।

कार्यक्रम का विवरण – बुनाई और सिलाई इकाइयों में शामिल होने, स्थानीय शिल्प को पुनर्जीवित करने तथा प्रोत्साहित करके समुदाय के लिए आजीविका के अवसरों को उपलब्ध कराने हेतु परिवर्तन कृतसंकल्प है। हम उनकी आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए स्वरोजगार द्वरा उन्हें सक्षम बनाने का प्रयास करते हैं। हम समुदाय के सााथ मिलकर क्षेत्र की तेजी से लुप्त हो रही बुनाई परंपराओं के संरक्षण मे मदद करने का प्रयास कर रह हैं और धीरे-धीरे एक रचनात्मक समाज का निर्माण करते हुए पूर्ण उत्पादन प्रक्रिया में संलग्न है।

सहयोग – हम अपनी इकाई में सर्वोत्तम प्रथाओं का अनुकरण करने और अपनाने के लिए राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान, शांतिनिकेतन, सेवाग्राम, कोरा, इको तसर सिल्क और त्रिमूर्ति एंटरप्राइजेज जैसे संगठनों के साथ सहयोग कर रहे हैं। हम पुरूषों और महिलाओं में कौशल विकास के साथ प्रशिक्षित करते हैं जिससे आत्मनिर्भर तरीके से वे अपनी आजीविका चला सके।पूर्व में हमने श्रीजनी फाउंडेशन के साथ भी सहयोग किया है।

केस स्टोरी

जमालहता बुनकरों के गाँव के नाम से प्रसिद्द है | इस गाँव में घर-घर बुनकर हुआ करते थे प्रतिदिन एक ट्रक कपड़े की बुनाई पूरी की जाती एवं देश के अन्य हिस्सों भेज दिया जाता था इस गाँव के बुने गये कपड़े विदेशों तक पहुँचाया जाता था | हरेक परिवार इस बुनकरी पर निर्भर है गाँव के बुनकर द्वारा तैयार किये गये ट्वील चादर और सूती मसहरी एक अपना अलग पहचान बना रखी थी 90 के दशक में जनता धोती के आर्डर प्राप्त करने के उपरांत मजदूरी न मिलने और पॉवर लूम की प्रतिस्पर्धा ने इस काम को पूरी तरह समाप्त कर दिया इसी दौरान गाँव के नवयुवकों में विदेश जाने की होड़ मच गई और देखते ही देखते लगभग हरेक परिवार से लोग विदेशों में नौकरियाँ करने लगे गाँव के बचे नवयुवक फेरी या मजदूरी करने लगे बुनकरी 1995 तक पूरी तरह समाप्त हो गई इस दौरान एक बुनकर की कहानी समेटा गया है – बुनकर परिवार में जन्मे नौसाद अंसारी गाँव के माहौल में मात्र कक्षा 10वीं तक की पढाई तो की पर वार्षिक परीक्षा में हिस्सा ले पाने की हिम्मत नहीं जुटा पाये घर में सभी भाई-बहनों में बड़े होने के कारण उसने पारिवारिक

 जिम्मेदारियों को सँभाला वे 8 वर्ष की उम्र से ही अपने पिता जी का साथ बुनकरी के कामों में देने लगे घर की हालत भी ठीक नहीं थी किसी तरह बुनकरी करके खाने-पीने का इन्तजाम हो जाता था वर्ष 1995 के आस-पास यह काम भी पूरी तरह बंद हो गया | विवश होकर इनको विदेश की यात्रा करनी पड़ी बचपन से इन्होंने बुनकरी के कौशल को ही सीखने का काम किया था, परन्तु वहाँ कुछ और करना पड़ा घर की रंगाई करते थे और 10 से 12 हज़ार का महीना कमाकर घर भेज दिया करते थे इनके भेजे हुये पैसे से घर संभल गया | इस दौरान घर में किसी तरह की तकलीफ होती तो ह्रदय इनका काँप जाता पर ये कुछ नहीं कर पाते उस समय फ़ोन की भी उतनी सुविधा नहीं थी कि घर के लोगों से ज्यादा बात करके मन हल्का कर पाते उस देश का नियम था कि अगर आप मौजूद हैं तो हर हाल में आपको ड्यूटी देनी पड़ेगी कई बार वे सोकर उठते हाथ में जूते लिए काम की ओर दौड़ पड़ते कई दिन तो ऐसा हुआ भी हुआ कि थोड़ी बहुत तबियत ख़राब थी फिर भी काम करना पड़ा ऐसे परिस्थिति में इनका मन बिलकुल ही नहीं लगता त्योहार में बच्चों और घर परिवार के लोगों को देखने एवं बात करने लिए तरस कर रह जाते वर्ष 2001 में इनकी शादी कर दी गई नौसाद जी शादी के बाद विदेश नहीं जाना चाहते थे लेकिन मज़बूरी में इनको पुनः जाना पड़ा विदेश की तकलीफों को देखते हुये भारत में ही काम करने का मन बना कर वापस लौट आये और पुणे में प्लम्बर के काम करने लगे यहाँ भी मजदूरी इतनी नहीं मिलती थी की कुछ दिन तक घर के लोगों के साथ वक्त दे सकें यह काम भी बिलकुल ऐसा काम था जो इनके बचपन में सीखे गये हुनर को दिन प्रतिदिन समाप्त कर रहा था फिर इन्होने गाँव जमालहता के नजदीक के बाज़ार गोपालपुर में एक प्लास्टिक के सामान का दुकान किया| दुकान से भी बहुत मुनाफा नहीं हुआ| इस बीच परिवर्तन जमालहता काम करना प्रारंभ कर दिया था | शुरू से ही देख रहे काम को करने की ललक तो हो रही थी पर अन्दर विश्वास नहीं हो रहा था की यह संस्था काम करेगी या नहीं | इसी उहापोह में एक वर्ष बीत गये | इधर दुकान ठीक से नहीं चलने के कारण मन अशांत था | इन्होने फिर मन ही मन तय किया कि हमे परिवर्तन के साथ जुड़कर काम करना है| सबसे पहले अपने बुनकरी के कामों को निखारने के लिए दूसरे-दूसरे बुनकरों के लूम का इस्तेमाल कर बुनकरी किया |जब आत्मविश्वास लौट आया तो परिवर्तन से जुड़ने की जिज्ञासा को सामने रखा तब इनके लिए सकारात्मक बात यह थी कि परिवर्तन को लूम बढ़ाने थे और बुनकर बहुत मुश्किल से तैयार हो रहे थे | इसी बीच इन्होंने काम शुरू किया | सबसे पहले दूसरे के घर में लूम रखा और बुनकरी की | उस जगह पर लूम तो रख लिए थे पर गन्दगी इतनी ज्यादा थी कि परिवर्तन से आये लोगों को वहाँ ले जाना पसंद नहीं करते थे | फिर इन्होने अपने घर में ही लूम रखने की जगह तैयार की और बुनाई शुरू क संस्था परिवर्तन से जुड़कर इन्होने शर्ट,पैंट,साड़ी,फरेवेल के लिए कपड़े तैयार किये और लगातार काम से जुड़े हैं बाकी बुनकरों की तुलना में इनकी गति धीमी है पर गुणवता और व्यवहार में अभीतक कमी नहीं आयासमय-समय पर परिवर्तन के हरेक दिए गये कामों को वे निःस्वार्थ भाव से करते गए | जमालहता बुनकरों को काफी मदद करते रहते हैं अब इनके व्यवहार के कारण इनके पिता सरपंच भी बन गये हैं | परिवर्तन से नौसाद जी इतना पैसा जरुर कमा लेते जितना विदेश में रहकर भी नहीं कमा पाते थे अपने घर-परिवार के साथ जुड़कर और बच्चों की शिक्षा पर ध्यान देकर 15 से 20 हज़ार रुपये प्रतिमाह कमा लेते हैं नौसाद जी

इनके घर के लोगों का कहना है कि कोई परिवार अपने घर के सदस्यों को अपने से दूर नहीं रहने देना चाहता|विदेश और अन्य राज्यों में हमारे परिवार के लिए झेले गये दुखों को सुनने के बाद ऐसा महसूस होता था कि हम गरीब परिवार में क्यूँ जन्म लिये हमेशा सोचते थे क्या इनकी जिंदगी दो वक्त की रोटी कमाने में इतना व्यस्त रहेगी कि हमलोग की खुशियों में ये शामिल नहीं हो पायेंगे ऐसे कई सवाल हमलोग को परेशान कर देता था पर जब से परिवर्तन के साथ जुड़ाव हुआ हम सभी मिलकर इनका सहयोग भी करते हैं और इनके तकलीफों के साथ खड़ा रहते हैं हमारे छोटे-छोटे बच्चों को पिता के लिए इन्‍तजार नहीं करना पड़ता वे हमेशा इनका ख्याल रखते हैं पिता के सरपंच बनाने में इनकी सबसे अहम् भूमिका रही गाँव के लोग भी काफी संख्या में इनसे जुड़े हुए हैं महिलाएँ हमेशा इनसे कुछ काम की शुरुआत करने के लिए कहती है| इनका कहना है कि अगर स्पिन्निंग का काम हमारे गाँव में करेंगे तो मैं 200 महिलाओं को काम से जोड़ दूँगा | कई बार देखा भी गया है कि जब गाँव का भ्रमण इनके साथ किया जाता है तो साथ के बाकी लोग बहुत आगे निकल जाते है और नौसाद जी कई लोगों से बात करते रह जाते हैं वापसी में इनसे मुलाकात फिर से हो पाती है गाँव में रहने से ये काफी समाजिक हो गये हैं गाँव के दुःख-सुख में ये सबसे आगे बढ़कर भागीदारी सुनिश्चित करते हैं

परिवर्तन से अबतक के कमाए गये पैसों से इन्होंने घर की मरम्मत की बहन की शादी में सहयोग किया घर का पूरा खर्च सँभाला सबसे बड़ी बात है कि ये परिवर्तन से प्राप्त  बच्चों की शिक्षा को आगे बढ़ाने में खर्च कर रहे हैं | इस काम से इनके भाई लोग भी काफी खुश है और संयुक्त भी हैं इनका कहाना है कि अगर परिवर्तन न होता तो शायद हमारा घर बिखर भी सकता था पर मैं यहाँ रहकर घर का खर्च संभाल लेता हूँ। हमारे भाई तेज़ी से विकास की तरफ रुख अपनाये हुए हैं और कुछ न कुछ लगातार कर भी रहे हैं इनका यह भी कहना है अगर परिवर्तन काम बंद करती है तो यहाँ के लोग कहने के लिए कुछ भी बोले पर असर तो इस काम से जुड़े हरेक लोगों पर पड़ेगा यूँ कहिये तो असर जमालहता गाँव पर पड़ेगा इनका कहना है कि परिवर्तन ही अब तक की संस्था है जो हर बुनकर को एक समान सम्मान देती है